समय मिलेगा तब नहीं, समय नियोजन कर 'संघ कार्य' करें!
हम अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं— "इच्छा तो बहुत है समाज के लिए कुछ करने की, पर क्या करें, बिल्कुल समय ही नहीं मिलता!" लेकिन क्या वास्तव में हमारे पास समय नहीं है, या फिर हमारी प्राथमिकताएं (Priorities) कुछ और हैं?
समय 'बचता' नहीं, समय 'निकाला' जाता है
सच्चाई यह है कि समय कभी किसी के पास 'बचता' नहीं है। दुनिया के सबसे व्यस्त और सबसे सफल व्यक्तियों के पास भी दिन के वही 24 घंटे होते हैं। अंतर सिर्फ इस बात का है कि वे अपने समय का निवेश कहाँ करते हैं। राष्ट्र कार्य या समाज सेवा कोई 'पार्ट-टाइम' शौक नहीं है जिसे फुर्सत में किया जाए, बल्कि यह एक उत्तरदायित्व है जिसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना पड़ता है।
"अनुशासन और राष्ट्र प्रेम की कोई उम्र नहीं होती"
नन्हा स्वयंसेवक: अनुशासन की पहली पाठशाला
हाल ही में एक नन्हे स्वयंसेवक के पोस्टर ने सोशल मीडिया पर सबका ध्यान खींचा। वह नन्हा बालक हमें सिखाता है कि अनुशासन और राष्ट्र के प्रति प्रेम की कोई उम्र नहीं होती। यदि बचपन से ही 'समय नियोजन' के संस्कार पड़ जाएं, तो व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर समाज के लिए समय निकालने में पीछे नहीं रहता।
'समय नियोजन' (Time Management) ही समाधान है
- नियोजन: अपने दिनभर के कार्यों की सूची बनाएं और देखें कि कहाँ समय व्यर्थ जा रहा है।
- प्राथमिकता: राष्ट्र कार्य को 'विकल्प' नहीं, बल्कि 'अनिवार्यता' मानें।
- संकल्प: यह तय करें कि चाहे कितनी भी व्यस्तता हो, दिन का कुछ समय समाज के उत्थान के लिए समर्पित होगा।
बहाने छोड़िए, नियोजित बनिए
"जब समय मिलेगा तब करेंगे" — यह वाक्य असल में कार्य को टालने का एक सभ्य तरीका है। राष्ट्र सेवा के लिए बहाने नहीं, बल्कि एक दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। जब मन में समाज के प्रति तड़प होती है, तो व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी संघ कार्य के लिए समय निकाल ही लेता है।
देश का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने व्यस्त हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी व्यस्तता के बीच राष्ट्र के लिए कितना समय निकालते हैं। आइए, हम भी उस नन्हे स्वयंसेवक की तरह अनुशासित बनें और समय नियोजन के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में अपनी आहुति दें।
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