संघ के शताब्दी वर्ष पर एक सूक्ष्म दृष्टि... 🕉️
एक स्वयंसेवक की दृष्टि से…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई नया विचार लेकर नहीं आया। वह तो भारत के सनातन जीवन मूल्यों को पुनः जागृत करने का कार्य करता है। संघ वही करता है जो सर्वमान्य और कालजयी है — जिसे इस राष्ट्र ने सदियों से अपने व्यवहार और संस्कृति में आत्मसात किया है।
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि “हिन्दू कोई संकीर्णता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह इस भूमि की जीवन-पद्धति का नाम है।” इस जीवन-पद्धति को खड़ा करने हेतु जिस संगठित कार्यपद्धति की आवश्यकता थी, उसे डॉ. हेडगेवार जी ने “शाखा” के रूप में विकसित किया। वहीं से संघ की अद्भुत साधना प्रारंभ हुई — कुछ स्वयंसेवकों से लेकर आज लाखों कार्यकर्ताओं तक की यह यात्रा एक संस्कार यात्रा बन गई।
“संघ केवल संगठन नहीं, एक साधना है — जो व्यक्तित्व निर्माण से राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ती है।”
शाखा में संस्कारित स्वयंसेवक जब समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उतरे, तो उन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में अनुशासन, संगठन और सेवा के माध्यम से परिवर्तन की लहर फैलाई। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, सेवा का, ग्रामोदय हो या राष्ट्ररक्षा — संघ की प्रेरणा से चलने वाले कार्यों ने भारत की नई चेतना का निर्माण किया।
संघ का उद्देश्य किसी पद, प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि में नहीं है। संघ चाहता है कि भारतवर्ष परमवैभव को प्राप्त करे, कि संगठित और सामर्थ्यवान हिन्दू समाज खड़ा हो — जो विश्व को फिर से मार्ग दिखाए। संघ का नाम इतिहास में रहे या न रहे, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता; परंतु भारत का नाम, भारत का गौरव और उसकी संस्कृति अमर रहे — यही संघ का स्वप्न है। 🇮🇳
“संघ का रहस्य यही है — नित नूतन और चिर पुरातन का संगम।”
संघ न किसी से स्पर्धा करता है, न किसी का विरोध। वह तो एक साधना है, जो दिन-प्रतिदिन निखरती जा रही है। आने वाले शताब्दियों तक यह साधना इसी राष्ट्रभूमि को ऊर्जावान और संस्कारित बनाए रखेगी। 🙏