संघ: विरोध के हजार बहाने पर जुड़ने का संकल्प सिर्फ एक
एक वैचारिक यात्रा – राष्ट्र प्रथम
आज के दौर में जब हम राष्ट्रवाद, समाजसेवा और संगठन की बात करते हैं, तो 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' (RSS) का नाम चर्चा के केंद्र में जरूर आता है। सोशल मीडिया से लेकर चाय की चौपालों तक, संघ को लेकर लोगों की अपनी-अपनी राय है।
भारत माता की जय
विरोध के बहाने अनेक...
अक्सर लोग संघ में न आने के या उससे दूरी बनाए रखने के सैकड़ों कारण गिनाते हैं। कोई इसे विचारधारा से जोड़ता है, कोई अनुशासन से, तो कोई अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं का हवाला देता है।
- "वहाँ का अनुशासन बहुत कड़ा है।"
- "मेरे पास शाखा जाने का समय नहीं है।"
- "मुझे उनकी गणवेश या प्रार्थना की पद्धति समझ नहीं आती।"
ये सभी तर्क मस्तिष्क के स्तर पर हो सकते हैं, लेकिन तर्कों से राष्ट्र नहीं बनते, संकल्प से बनते हैं।
जुड़ने का आधार: सिर्फ एक मंत्र
संघ कोई संगठन मात्र नहीं, बल्कि एक भाव है — राष्ट्र सर्वोपरि का भाव। जब स्वयंसेवक ध्वज के सामने खड़ा होता है, तो वह किसी व्यक्ति या दल की नहीं, केवल मातृभूमि की जय बोलता है।
संघ में आने का वास्तविक अर्थ
1. स्वयं से ऊपर राष्ट्र: संघ सिखाता है कि व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा राष्ट्र होता है।
2. समरसता: "भारत माता की जय" कहने वाला हर व्यक्ति अपना है — जाति, भाषा या प्रांत से ऊपर।
3. निस्वार्थ सेवा: आपदा के समय सबसे पहले खड़े होने की प्रेरणा संघ संस्कार से आती है।
निष्कर्ष
यदि भारत के लिए प्रेम आपके हृदय में है, यदि राष्ट्र के लिए कुछ करने की तड़प है, तो समझ लीजिए — आप पहले से ही वैचारिक रूप से स्वयंसेवक हैं।
"परम वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं..."
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