इतिहास की चोट: संपत्ति नहीं — संगठन बचाता है
यह लेख उनके लिए है जो मानते हैं कि निजी सुरक्षा ही अंतिम सत्य है। यह लेख उनके लिए है जो आने वाले कल की आहट को आज सुनना चाहते हैं।
हम व्यापार करते हैं, कोठियां बनाते हैं, और सोचते हैं कि हमारे बैंक बैलेंस हमें हर संकट से बचा लेंगे। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटिए, क्या सिर्फ अमीरी ने कभी किसी कौम को बचाया है?
जब काबुल जला, तो वहां के व्यापारियों की तिजोरियां उनके साथ ही राख हो गईं। क्योंकि उनके पास सोना तो था, पर उस सोने की रक्षा करने वाला "संगठन" नहीं था।
आज भी समाज उसी भ्रम में है। हम अपनी अलग-अलग पहचानों, जातियों और निजी हितों में इतने व्यस्त हैं कि हम यह भूल गए कि जब समंदर में तूफान आता है, तो किनारे पर बना सबसे महंगा महल भी सुरक्षित नहीं रहता।
खतरा सिर्फ बाहर से नहीं है, खतरा हमारी उस खामोशी और बिखराव से भी है जिसे हम 'प्रगति' कह रहे हैं। असली प्रगति तब है जब समाज का हर व्यक्ति दूसरे के लिए खड़ा होने का हौसला रखे।
संस्कार
अपनी नई पीढ़ी को केवल इंजीनियर-डॉक्टर न बनाएं, उन्हें अपनी जड़ों और गौरवशाली इतिहास का ज्ञान भी दें।
सहयोग
स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे समूह बनाएं। सुख-दुख में साथ खड़े होने की आदत ही बड़े संगठन की नींव है।
चेतना
आस-पास हो रही घटनाओं के प्रति सजग रहें। उदासीनता ही गुलामी का पहला कदम होती है।
RSS जैसे संगठन दशकों से एक ही बात समझा रहे हैं—व्यक्ति को नहीं, समाज को शक्तिशाली बनाओ। क्योंकि शक्तिशाली समाज ही व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी होता है।
सार: धन कमाना गौरव है, लेकिन संगठन बनाना सुरक्षा है। बिना संगठन के धन केवल विलासिता है, शक्ति नहीं।
अंत में, यह चुनाव आपका है। आप एक समृद्ध लेकिन कमजोर भीड़ बने रहना चाहते हैं, या एक संगठित और अजेय राष्ट्र। समय किसी का इंतजार नहीं करता।
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