स्वयंसेवक: भय या स्वार्थ नहीं,आत्मीयता का पर्याय
संघ में स्वयंसेवक बनने की कहानी किसी आदेश से नहीं, भीतर से उठी पुकार से शुरू होती है। जब समाज अपना लगता है, तब सेवा बोझ नहीं स्वभाव बन जाती है।
"किसी मजबूरी, स्वार्थ या भय के कारण नहीं, बल्कि समाज-प्रेम के कारण।"
परिचय
ये तीन वाक्य किसी संगठन के लिए मात्र भर्ती के शब्द नहीं हैं, बल्कि ये एक बेहद गहरी चेतावनी हैं — संगठन और स्वयंसेवक दोनों को बचाने वाली। संघ का स्वयंसेवक बनना कोई 'फैशन' या 'करियर' नहीं, बल्कि यह समाज-बोध की पुकार है।
भय, स्वार्थ और मजबूरी: तीन विष
भय
भय किसी को रक्षक नहीं, कायर बनाता है। कायरों से स्वयंसेवक नहीं बनते।
स्वार्थ
स्वार्थ व्यक्ति को व्यापारी बना देता है, और व्यापारी कभी निस्वार्थ समाज नहीं बना सकता।
मजबूरी
मजबूरी व्यक्ति को दयनीय बना देती है, और दयनीय मनोवृत्ति से त्याग का मार्ग नहीं चलता।
समाज को परिवार के रूप में देखना
संघ में स्वयंसेवक वही है, जिसकी आत्मा कहती है — यह समाज मेरा है। इसका प्रत्येक व्यक्ति मेरे अपनों जैसा है। उसके सुख में मेरा आनंद और उसके दुख में मेरी रात्रि निश्चिंत नहीं रहती।
(माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं)
स्वयंसेवक का मूल चरित्र
अनुशासन: वह खुद को राष्ट्र की सेवा के लिए एक सांचे में ढालता है।
समय का दान: वह समय खर्च नहीं करता, बल्कि राष्ट्र के लिए निवेश करता है।
करुणा: उसके भीतर समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए संवेदना है।
अहंकार शून्यता: वह राष्ट्र के लिए काम करता है, अपने नाम के लिए नहीं।
निष्कर्ष
जो मनुष्य समाज के दुःख से बेचैन होता है, वही समाज की रक्षा के लिए आगे आ सकता है। संघ किसी को रोकता भी नहीं और बुलाता भी नहीं — यह तो बस तैयार लोगों के लिए खुला आकाश है।
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